कपड़ा उद्योग को बड़ी राहत, दिसंबर तक बिना इंपोर्ट ड्यूटी के विदेश से मंगा सकेंगे कपास; सरकार ने बढ़ाई छूट
Yuva India: केंद्र सरकार ने कपड़ा और गारमेंट उद्योग को बड़ी राहत देते हुए कपास (कॉटन) के आयात पर कस्टम ड्यूटी की छूट दो महीने के लिए बढ़ा दी है। अब भारतीय कंपनियां 31 दिसंबर 2026 तक विदेश से कपास बिना लागू कस्टम ड्यूटी के आयात कर सकेंगी। इससे पहले यह छूट 31 अक्टूबर को समाप्त होने वाली थी। सरकार के इस फैसले से कपड़ा मिलों, गारमेंट निर्माताओं और छोटे-मझोले उद्योगों को कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने तथा उत्पादन लागत कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग ने 30 अक्टूबर 2026 को इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। इसके तहत पहले जारी अधिसूचना में बदलाव करते हुए कपास आयात पर शुल्क छूट की समयसीमा 31 अक्टूबर से बढ़ाकर 31 दिसंबर कर दी गई है। सरकार ने यह फैसला घरेलू कपड़ा उद्योग की कच्चे माल की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया है।
11 प्रतिशत आयात शुल्क से मिल रही राहत
केंद्र सरकार ने 30 मई 2026 को कपास के आयात पर अस्थायी रूप से कस्टम ड्यूटी में छूट देने का फैसला किया था। यह छूट 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक लागू की गई थी। सामान्य तौर पर कपास के आयात पर करीब 11 प्रतिशत शुल्क लगता था। इस राहत के तहत पात्र कपास आयात पर बेसिक कस्टम ड्यूटी और एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस (AIDC) से छूट दी गई थी।
अब सरकार ने इस अवधि को दो महीने और बढ़ा दिया है। इससे कपड़ा कंपनियों को दिसंबर के अंत तक बिना इन शुल्कों के कपास आयात करने का मौका मिलेगा। यह बदलाव वित्त मंत्रालय की अधिसूचना संख्या 35/2026-Customs के माध्यम से किया गया है।
कपड़ा मिलों की लागत कम करने की कोशिश
कपास कपड़ा उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इससे धागा, कपड़ा और रेडीमेड गारमेंट तैयार किए जाते हैं। कपास की कीमतों में बढ़ोतरी होने पर स्पिनिंग मिलों से लेकर कपड़ा और परिधान बनाने वाली कंपनियों तक की उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
ऐसे में आयात शुल्क की छूट जारी रहने से कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से कपास खरीदने का विकल्प मिलेगा। इससे घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ सकती है और कच्चे माल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। खासतौर पर छोटी और मध्यम इकाइयों (MSMEs) को इस फैसले से राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि उनके लिए कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कारोबार पर ज्यादा पड़ता है।
कपास की कम पैदावार भी फैसले की वजह
इस साल घरेलू कपास उत्पादन को लेकर भी चिंता बनी हुई है। कमजोर मानसून और फसल पर कीटों के असर से उत्पादन की संभावनाओं पर दबाव पड़ा है। आमतौर पर अक्टूबर में नई फसल की आवक शुरू होने के बाद घरेलू बाजार में कपास की कीमतों में नरमी आती है, लेकिन इस बार कीमतें अपेक्षा के मुताबिक कम नहीं हुईं।
इसी वजह से कपड़ा मिलों और उद्योग संगठनों ने सरकार से आयात शुल्क की छूट बढ़ाने की मांग की थी। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, उद्योग को कच्चे माल की ऊंची कीमतों और सीमित उपलब्धता से परेशानी हो रही थी। सरकार के इस फैसले से अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से कपास का आयात बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।
किसानों पर पड़ सकता है असर
जहां इस फैसले से कपड़ा उद्योग को राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं घरेलू कपास किसानों के हितों को लेकर चिंता भी सामने आई है। नई फसल की आवक के समय यदि विदेश से बड़ी मात्रा में सस्ता कपास आयात होता है, तो घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
इससे किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम मिलने में परेशानी हो सकती है। खासतौर पर उन किसानों पर असर पड़ने की आशंका है, जिनकी फसल बाजार में पहुंच रही है। इसलिए सरकार के सामने कपड़ा उद्योग को सस्ता कच्चा माल उपलब्ध कराने के साथ-साथ घरेलू किसानों के हितों का संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है।
क्या कपड़े और गारमेंट सस्ते होंगे?
आयात शुल्क में छूट से कपड़ा निर्माताओं की लागत कम होने की संभावना है। हालांकि इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि बाजार में कपड़े, टी-शर्ट, शर्ट या अन्य रेडीमेड उत्पाद तुरंत सस्ते हो जाएंगे। अंतिम कीमत पर कपास के अलावा उत्पादन, मजदूरी, परिवहन, बिजली और अन्य खर्चों का भी असर पड़ता है।
यदि कच्चे माल की कीमतों में कमी आती है और कंपनियां इसका लाभ ग्राहकों तक पहुंचाती हैं, तो आने वाले समय में कपड़ा और गारमेंट उत्पादों की कीमतों में राहत मिल सकती है। फिलहाल सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा कपड़ा उद्योग को कच्चे माल की उपलब्धता और लागत के मोर्चे पर मिलने की उम्मीद है।
