अमेरिका में सख्त नियम, भारत में ढिलाई; सोशल मीडिया की लत का शिकार हो रहे बच्चे
Yuva India: सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों और किशोरों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए लगातार नए फीचर और एल्गोरिदम का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके चलते कई बच्चे कम उम्र में ही सोशल मीडिया के आदी होते जा रहे हैं। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सख्त नियम बनाए जा रहे हैं, जबकि भारत में अभी इस दिशा में प्रभावी और व्यापक नियमों का इंतजार है।
सोशल मीडिया कंपनियों के लिए अलग-अलग देशों में सुरक्षा के मानक अलग दिखाई देते हैं। भारत में इन कंपनियों का बड़ा यूजर बेस होने के बावजूद बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर कई सवाल बने हुए हैं।
रात में भी मोबाइल से चिपके रहते हैं बच्चे
दिल्ली के 14 वर्षीय एक बच्चे जो रात करीब 11:40 बजे तक मोबाइल पर रील और लेट-नाइट कंटेंट देखता रहता है। एक वीडियो देखने के बाद दूसरा वीडियो अपने आप चलने लगता है। इस तरह बच्चा लगातार स्क्रीन पर समय बिताता रहता है।
एल्गोरिदम बच्चों की पसंद और देखने की आदतों को समझकर उसी तरह का कंटेंट बार-बार दिखाते हैं। इससे बच्चों के लिए मोबाइल छोड़ना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों की नींद, पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
भारत में बच्चों की सुरक्षा को लेकर क्या है स्थिति ?
भारत में यूट्यूब पर उम्र की पुष्टि करने का प्रभावी तरीका सीमित है। वहीं, मेटा के प्लेटफॉर्म पर 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए अकाउंट बनाने और अनुचित कंटेंट तक पहुंचने से जुड़े जोखिम बने हुए हैं।
मेटा और अन्य सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों की सुरक्षा के लिए कुछ फीचर उपलब्ध कराती हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता और निगरानी को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
भारत में बच्चों के लिए डिजिटल सुरक्षा के व्यापक और प्रभावी नियमों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। रिपोर्ट में 2027 में लक्षित विज्ञापन और उम्र के आधार पर सुरक्षा से जुड़े नियमों के लागू होने की संभावना का भी उल्लेख किया गया है।
अमेरिका और यूरोप में सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्ती
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सख्त प्रावधान किए गए हैं। इन देशों में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की ट्रैकिंग, प्रोफाइलिंग और लक्षित विज्ञापन पर नियंत्रण लगाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया में भी कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं। यूरोपीय देशों में बच्चों की डिजिटल गतिविधियों और निजी जानकारी की सुरक्षा को लेकर अलग-अलग नियम लागू हैं।
इसके विपरीत भारत में बच्चों की उम्र की पुष्टि, उनकी ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी और अनुचित कंटेंट से सुरक्षा को लेकर अभी और मजबूत व्यवस्था की जरूरत बताई गई है।
मेटा के सुरक्षा बजट पर भी उठे सवाल
मेटा के सुरक्षा बजट को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि भारत मेटा के सबसे बड़े बाजारों में शामिल है, लेकिन यहां सुरक्षा पर खर्च का अनुपात अपेक्षाकृत कम है।
2021 के आंतरिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया गया है कि मेटा ने अमेरिका में गलत सूचनाओं से निपटने के लिए अपने बजट का बड़ा हिस्सा खर्च किया। इसके मुकाबले भारत जैसे बड़े बाजारों में सुरक्षा निवेश को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया कंपनियों को केवल यूजर बढ़ाने और विज्ञापन से कमाई करने पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि बच्चों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।
रोब्लॉक्स में चैट से पहले उम्र की जांच
बच्चों के बीच लोकप्रिय ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म रोब्लॉक्स में भी उम्र की पुष्टि को लेकर नए बदलावों का उल्लेख किया गया है। जनवरी 2026 से प्लेटफॉर्म पर चैट करने के लिए उम्र की जांच अनिवार्य करने की व्यवस्था शुरू की गई।
इसका उद्देश्य बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराना है। उम्र के आधार पर यूजर्स को अलग-अलग समूहों में बांटने से बच्चों और वयस्कों के बीच अनावश्यक संपर्क को सीमित करने में मदद मिल सकती है।
इस तरह की व्यवस्था भारत में भी प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत है, ताकि बच्चों को ऑनलाइन धोखाधड़ी, अनुचित संपर्क और साइबर जोखिमों से बचाया जा सके।
बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए क्या हैं जरूरी उपाय ?
रिपोर्ट में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा मजबूत करने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं।
1. एडिक्टिव फीचर पर नियंत्रण: बच्चों के अकाउंट में ऐसे फीचर सीमित किए जाएं, जो उन्हें लगातार स्क्रीन देखने के लिए प्रेरित करते हैं।
2. उम्र के अनुसार सुरक्षा: अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों के लिए अलग सुरक्षा मानक और कंटेंट फिल्टर लागू किए जाएं।
3. नाबालिगों की प्रोफाइलिंग पर रोक: बच्चों के संवेदनशील डेटा और ऑनलाइन गतिविधियों का व्यावसायिक इस्तेमाल नियंत्रित किया जाए।
4. लक्षित विज्ञापन पर नियंत्रण: बच्चों को उनकी ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर विज्ञापन दिखाने की प्रक्रिया पर सख्त नियम बनाए जाएं।
5. बाल सुरक्षा नियम लागू हों: डिजिटल प्लेटफॉर्म को बच्चों के डेटा से जुड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य बनाया जाए।
6. सुरक्षा मानक तय किए जाएं: शिकायतों की जांच करने और नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर कार्रवाई के लिए स्वतंत्र नियामक व्यवस्था विकसित की जाए।
भारत में भी मजबूत डिजिटल सुरक्षा कानून की जरूरत
सोशल मीडिया का इस्तेमाल आज बच्चों की पढ़ाई, मनोरंजन और जानकारी हासिल करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। लेकिन इसके साथ ऑनलाइन लत, साइबर बुलिंग, अनुचित कंटेंट और निजी जानकारी के दुरुपयोग जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
ऐसे में जरूरी है कि सरकार, अभिभावक, स्कूल और सोशल मीडिया कंपनियां मिलकर बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करें। केवल स्क्रीन टाइम कम करने की सलाह देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।
भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम, उम्र की सही पहचान, पारदर्शी एल्गोरिदम और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था समय की मांग बनती जा रही है।
