जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान 200 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेने का दावा; कोर्ट ने पुलिस से मांगा जवाब, अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को
Yuva India: दिल्ली में कांग्रेस और अन्य संगठनों से जुड़े प्रदर्शनकारियों की हिरासत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शन रोकने के लिए पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए याचिकाकर्ताओं ने अदालत से हस्तक्षेप की मांग की। रविवार को छुट्टी के दिन मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से जवाब मांगा और कहा कि लोगों को अवैध तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।
दिल्ली में प्रदर्शन के दूसरे दिन भी पुलिस ने 200 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। इनमें कांग्रेस, छात्र संगठनों और अन्य समूहों से जुड़े लोग शामिल बताए गए हैं। प्रदर्शनकारियों की हिरासत को लेकर अदालत में याचिका दायर की गई थी, जिसमें पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि लोगों को अवैध तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन रोकने के लिए पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया और उन्हें विरोध दर्ज कराने से रोका।
अदालत ने मामले में पुलिस से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई करते समय कानून और तय प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, 200 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेने का दावा
दिल्ली में भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कांग्रेस और अन्य संगठनों से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर की ओर बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने कार्रवाई की। इस दौरान कई लोगों को हिरासत में लिया गया।
हिरासत में लिए गए लोगों में छात्र संगठनों के सदस्य और राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल बताए गए। कुछ प्रदर्शनकारियों को पुलिस वाहनों में बैठाकर अलग-अलग स्थानों पर ले जाया गया। इस कार्रवाई के बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति बनी रही।
हालांकि, हिरासत में लिए गए लोगों की सही संख्या और उन्हें किन कानूनी प्रावधानों के तहत रोका गया, इसकी आधिकारिक पुष्टि संबंधित पुलिस रिकॉर्ड से होना जरूरी है।
नौ अक्टूबर के निर्देशों का पालन नहीं होने का आरोप
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में आरोप लगाया कि नौ अक्टूबर को जारी निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। याचिका में कहा गया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई से उनके शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर असर पड़ा है।
सुनवाई के दौरान मामले को प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना से जुड़ा मुद्दा भी बताया गया। हालांकि, किसी आदेश की अवहेलना हुई है या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण अदालत के तथ्यों और संबंधित पक्षों के जवाब पर निर्भर करेगा।
एक साल शांति की शर्त पर रिहा हुए कुछ प्रदर्शनकारी
कांग्रेस नेताओं दीपक सिंह, संदीप दीक्षित और अन्य लोगों को एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया गया। प्रत्येक व्यक्ति से 50 हजार रुपये का मुचलका भरवाया गया।
इस मामले में यह भी आरोप लगाया गया कि पुलिस कार्रवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती की गई। कुछ लोगों ने हिरासत में लिए जाने और विरोध दर्ज कराने से रोके जाने पर आपत्ति जताई। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित अधिकारियों के जवाब और अदालत में रखे गए रिकॉर्ड के आधार पर ही की जा सकेगी।
पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल
प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई धक्का-मुक्की को लेकर भी सवाल उठाए गए। कुछ लोगों ने पुलिस पर बल प्रयोग करने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। ऐसे में कार्रवाई के दौरान कानूनी प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद अब पुलिस के जवाब और अदालत की अगली सुनवाई पर नजर रहेगी। अदालत के निर्देशों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रदर्शनकारियों की हिरासत और पुलिस की कार्रवाई को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।
