हिमाचल में सेब की फसल पर मौसम की मार, फूल आने में देरी और बढ़ते तापमान से उत्पादन प्रभावित
Yuva India: हिमाचल प्रदेश में इस साल सेब की फसल पर मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का असर देखने को मिल रहा है। फूल आने में देरी, सर्दियों में पर्याप्त ठंड न पड़ना, बढ़ता तापमान और पौधों में बीमारियों जैसी समस्याओं के कारण सेब उत्पादन में गिरावट की आशंका बढ़ गई है। बाजारों में सेब की आवक भी पिछले साल के मुकाबले काफी कम दर्ज की गई है। बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन में सुधार के लिए मौसम के अनुकूल खेती, बेहतर पौध सामग्री और बागों के वैज्ञानिक प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है।
15 अक्टूबर को शिमला से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में 14 अक्टूबर 2025 तक करीब 4.20 लाख मीट्रिक टन सेब बाजारों में पहुंच चुका था। इसके विपरीत, इस साल 14 अक्टूबर तक मंडियों में सेब की आवक केवल 1.29 लाख मीट्रिक टन दर्ज की गई। यह अंतर राज्य के सेब कारोबार और बागवानों की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ाता है।
पिछले साल के मुकाबले मंडियों में कम पहुंचा सेब
हिमाचल प्रदेश के बागवानी निदेशक सतीश कुमार शर्मा के अनुसार, राज्य में वर्ष 2025 के दौरान कुल सेब उत्पादन लगभग 6.99 लाख मीट्रिक टन रहा था। पिछले साल 14 अक्टूबर तक करीब 4.20 लाख मीट्रिक टन सेब मंडियों में पहुंच गया था।
इस साल शुरुआती अनुमान के मुताबिक, राज्य में 3.50 लाख से 4 लाख मीट्रिक टन सेब उत्पादन की उम्मीद जताई गई थी। हालांकि, मंडियों में अब तक दर्ज हुई कम आवक से लक्ष्य हासिल करने को लेकर चिंता बढ़ी है। अधिकारियों को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में उत्पादन में सुधार हो सकता है।
फूल आने में देरी और तापमान में बदलाव बड़ी वजह
बागवानी वैज्ञानिकों के मुताबिक, सेब की फसल को बेहतर फूल आने और फल बनने के लिए सर्दियों में पर्याप्त ठंड की जरूरत होती है। इस बार कुछ क्षेत्रों में ठंड के घंटे कम रहने और मौसम में उतार-चढ़ाव का असर फूल आने की प्रक्रिया पर पड़ा।
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), रोहड़ू की प्रभारी बागवानी वैज्ञानिक डॉ. उषा शर्मा ने बताया कि मौसम से जुड़ा तनाव उत्पादन घटने का प्रमुख कारण रहा। इसके अलावा, कम ऊंचाई वाले सेब उत्पादक क्षेत्रों में भी असर देखा गया है। सोलन, हमीरपुर, शिमला, कुल्लू और सिरमौर के कुछ हिस्सों में फसल प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है।
कुछ क्षेत्रों में सेब के पेड़ों पर सितंबर और अक्टूबर में फूल आए, जबकि सामान्य तौर पर फूल आने का प्रमुख समय मार्च और अप्रैल होता है। फूल आने के समय में इस तरह का बदलाव फल बनने और उसकी गुणवत्ता पर असर डाल सकता है।
बागों में बीमारी और पत्तियां गिरने से भी नुकसान
विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ सेब उत्पादक क्षेत्रों में फंगल बीमारियों, खासकर अल्टरनेरिया जैसी समस्याओं के कारण पत्तियां समय से पहले गिरने की घटनाएं सामने आईं। स्वस्थ पत्तियां पेड़ में पोषक तत्व जमा करने और अगले मौसम की फसल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। समय से पहले पत्तियां गिरने से फल की वृद्धि और अगले सीजन की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा, सर्दियों में पर्याप्त ठंड न पड़ना, फूल और फल बनने के समय मौसम में तनाव, पुराने बाग तथा कम गुणवत्ता वाली पौध सामग्री भी उत्पादन में गिरावट की वजह हो सकते हैं।
बागवानों की कमाई पर असर
रिपोर्ट में शिमला के भट्टाकुफर फल मंडी में कारोबार करने वाले आढ़तियों और बागवानों की परेशानी का भी जिक्र है। एक कमीशन एजेंट अब्दुल के अनुसार, इस साल सेब की आवक इतनी कम रही कि उन्हें पिछले वर्षों की तरह कारोबार नहीं मिल पाया।
कोटगढ़ के प्रगतिशील बागवान हरि चंद रोच ने बताया कि पिछले साल उनके बाग से करीब 3,000 यूनिवर्सल कार्टन सेब का उत्पादन हुआ था, जबकि इस साल लगभग 800 बॉक्स ही तैयार हो पाए। उनके अनुसार, राज्य के कई अन्य बागवानों ने भी इसी तरह कम उत्पादन की शिकायत की है।
उत्पादन बढ़ाने के लिए क्या जरूरी ?
विशेषज्ञों ने स्वस्थ और वायरस-मुक्त पौधों, आधुनिक नर्सरी सुविधाओं, पुराने बागों के नवीनीकरण, बीमारी की समय पर पहचान और बेहतर जल प्रबंधन पर जोर दिया है। बागों में वैज्ञानिक तरीके अपनाने से बदलती जलवायु के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल में सेब की औसत उत्पादकता लगभग 4 से 5 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है, जो कुछ प्रमुख सेब उत्पादक देशों में दर्ज 40 से 50 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता से काफी कम है।
हिमाचल की अर्थव्यवस्था में सेब बागवानी की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में मौसम के बदलते पैटर्न के अनुरूप खेती और बागों का बेहतर प्रबंधन आने वाले वर्षों में उत्पादन तथा बागवानों की आय को स्थिर रखने के लिए अहम होगा।
