अनुपस्थित रहने पर भी नहीं छीना जा सकता वोट का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा- 47 लाख मतदाताओं तक पहुंचें
Yuva India: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर हुए करीब 47 लाख मतदाताओं के मामले में चुनाव आयोग को अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि केवल अनुपस्थित रहने या गणना फॉर्म जमा नहीं कर पाने के आधार पर किसी व्यक्ति को हमेशा के लिए मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। आयोग को ऐसे मतदाताओं से संपर्क करने और उनके नाम दोबारा सूची में शामिल करने की प्रक्रिया आसान बनाने के लिए व्यवस्था तैयार करनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज थे, उन्हें नाम छूट जाने के बाद पहली बार वोटर बनने वालों के लिए निर्धारित फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
दिल्ली में 1.45 करोड़ मतदाताओं की सूची से जुड़े हैं 47 लाख मामले
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू होने से पहले मतदाता सूची में करीब 1.45 करोड़ मतदाता दर्ज थे। इनमें से लगभग 97.53 लाख मतदाताओं ने गणना फॉर्म जमा किए, जबकि करीब 47.56 लाख मतदाताओं के फॉर्म वापस नहीं मिले।
इन मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट जैसी श्रेणियों में रखा गया। चुनाव आयोग की प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट मतदाता सूची 31 अगस्त को प्रकाशित की गई थी। इस दौरान बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम सूची में आगे नहीं बढ़ पाए, जिनसे पुराने पते पर संपर्क नहीं हो सका था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने अदालत में कहा कि कई लोगों को गणना फॉर्म मिला ही नहीं या वे पुराने पते पर उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में उन्हें नए मतदाता की तरह आवेदन करने के लिए कहना परेशानी बढ़ा सकता है।
‘मतदाता तक पहुंचने की जिम्मेदारी आयोग की भी’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली जैसे बड़े शहरों में लोगों का नौकरी, पढ़ाई और अन्य कारणों से एक जगह से दूसरी जगह जाना सामान्य है। केवल इस आधार पर कि कोई व्यक्ति पुराने पते पर नहीं मिला या उसने तय समय में फॉर्म जमा नहीं किया, यह नहीं माना जा सकता कि उसने अपना मतदान का अधिकार खो दिया है।
पीठ ने चुनाव आयोग से पूछा कि प्रभावित मतदाताओं को खुद कार्यालयों के चक्कर लगाने के लिए कहने के बजाय आयोग उन तक पहुंचने का प्रयास क्यों नहीं करता। अदालत ने सुझाव दिया कि ऐसे मतदाताओं की सूची सार्वजनिक की जाए, जिनसे संपर्क नहीं हो पाया। सूची में उनकी पुरानी मतदाता प्रविष्टि का विवरण भी दिया जा सकता है, ताकि वे अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकें और नजदीकी बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क कर सकें।
फॉर्म-6 और फॉर्म-8 को लेकर उठे सवाल
अदालत ने फॉर्म-6 और फॉर्म-8 के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए। फॉर्म-6 का उपयोग सामान्य तौर पर मतदाता सूची में पहली बार नाम जुड़वाने के लिए होता है, जबकि फॉर्म-8 का इस्तेमाल पहले से पंजीकृत मतदाता के पते में बदलाव जैसी जानकारी अपडेट करने के लिए किया जाता है।
पीठ का कहना था कि यदि कोई व्यक्ति पहले से मतदाता सूची में दर्ज था और केवल उसका पता बदला है, तो उसे यह घोषणा करने के लिए बाध्य करना उचित नहीं होगा कि उसका नाम पहले कभी मतदाता सूची में था ही नहीं। अदालत ने आयोग से इस प्रक्रिया को स्पष्ट करने और प्रभावित मतदाताओं के लिए सरल विकल्प उपलब्ध कराने को कहा।
समयसीमा बढ़ाने और फॉर्म स्वीकार करने पर विचार
सुनवाई के दौरान अदालत ने आयोग से यह भी कहा कि वह केवल तय समयसीमा के आधार पर प्रभावित मतदाताओं के दावों को रोकने के बजाय गणना फॉर्म स्वीकार करने की संभावना पर विचार करे। उस समय दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर निर्धारित थी।
चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने कहा कि आयोग अदालत के सुझावों पर विचार करेगा और आवश्यक कदम उठाने के लिए अधिकारियों से चर्चा करेगा। सुनवाई के दौरान समयसीमा बढ़ाने की संभावना पर भी बात हुई।
हालांकि, अदालत ने इस सुनवाई में समयसीमा बढ़ाने का कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं किया। आयोग को अपनी ओर से उचित कदम उठाने और करीब दो सप्ताह बाद अगली सुनवाई में स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर फैसला अभी बाकी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति के आधार पर नामों की जांच और उन्हें हटाने की प्रक्रिया की वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं दिया गया है। अदालत ने इस श्रेणी के तहत नोटिस जारी करने के मानदंडों और प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
इस मामले में आगे की सुनवाई करीब दो सप्ताह बाद होगी। फिलहाल अदालत का जोर इस बात पर है कि पात्र मतदाताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का उचित अवसर मिले।
