सर्दियों से पहले बढ़ने लगा प्रदूषण, उत्तर प्रदेश के कई शहर भी प्रभावित; वाहनों से निकलने वाला धुआं और धूल बने बड़ी चुनौती
Yuva India: देश के कई हिस्सों में सर्दियों की शुरुआत से पहले ही वायु प्रदूषण बढ़ने लगा है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा के कई शहरों में हवा की गुणवत्ता चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की निगरानी में शामिल 254 शहरों में से केवल 123 शहरों की हवा अच्छी या संतोषजनक श्रेणी में दर्ज की गई। वहीं, 111 शहरों में वायु गुणवत्ता मध्यम, 17 में खराब और तीन शहरों में बेहद खराब श्रेणी में रही।
हरियाणा के पंचगांव में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 378 दर्ज किया गया, जबकि उत्तर प्रदेश के हापुड़ और बड़ौत में AQI 328 रहा। ये आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण की समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में भी हवा की गुणवत्ता बिगड़ रही है।
पंचगांव और उत्तर प्रदेश के शहरों में प्रदूषण ज्यादा
हरियाणा के पंचगांव में AQI 378 दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश के हापुड़ और बड़ौत का AQI 328, बागपत का 282 और मेरठ का 281 रहा। हरियाणा के करनाल में AQI 242 दर्ज किया गया, जबकि ओडिशा के अंगुल में यह 244 रहा। राजस्थान के खैरथल में AQI 232 दर्ज किया गया।
दिल्ली का AQI 223 बताया गया था। दिल्ली-NCR के 29 शहरों में से 13 शहरों की हवा खराब स्थिति में पहुंचने की बात भी सामने आई। अलग-अलग शहरों के आंकड़े समय और निगरानी केंद्र के अनुसार बदल सकते हैं, इसलिए इन्हें संबंधित तारीख के आंकड़ों के रूप में देखना जरूरी है।
देशभर में PM2.5 और PM10 की चुनौती
वायु प्रदूषण बढ़ने के प्रमुख कारणों में PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण शामिल हैं। ये कण वाहनों के धुएं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक गतिविधियों और अन्य स्रोतों से हवा में पहुंचते हैं।
PM2.5 आकार में बेहद छोटे कण होते हैं, जो सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहने से खांसी, सांस लेने में परेशानी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। पहले से सांस या हृदय संबंधी परेशानी झेल रहे लोगों, बच्चों और बुजुर्गों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है।
वाहनों का धुआं भी प्रदूषण की बड़ी वजह
भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान के आंकड़ों के हवाले से बताया गया कि दिल्ली में एक दिन वाहन उत्सर्जन का योगदान प्रदूषण में 19 प्रतिशत रहा, जबकि पराली जलाने का योगदान सात प्रतिशत आंका गया। ये आंकड़े दिल्ली-NCR की संबंधित अवधि के हैं और इन्हें पूरे देश पर लागू नहीं किया जा सकता।
वाहनों से निकलने वाला धुआं, सड़क की धूल और निर्माण गतिविधियां शहरी प्रदूषण को बढ़ा सकती हैं। वहीं, फसल अवशेष जलाने की घटनाएं कुछ क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता को और प्रभावित करती हैं। प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए इन सभी स्रोतों पर एक साथ काम करना जरूरी है।
सरकार और प्रशासन के सामने क्या है चुनौती?
दिल्ली-NCR में वायु गुणवत्ता बिगड़ने के बाद ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के पहले चरण के तहत प्रदूषण नियंत्रण के उपाय लागू किए गए थे। इन उपायों में धूल नियंत्रण, निर्माण स्थलों की निगरानी और प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर कार्रवाई जैसे कदम शामिल हैं।
हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए कार्रवाई की जानकारी भी रिपोर्ट में दी गई। हालांकि, प्रदूषण पर स्थायी नियंत्रण के लिए केवल मौसमी कदम पर्याप्त नहीं हैं। सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना, वाहनों के उत्सर्जन पर नियंत्रण, औद्योगिक प्रदूषण की निगरानी और निर्माण स्थलों पर धूल रोकने जैसे उपाय लगातार लागू करने होंगे।
आम लोग कैसे रखें अपना बचाव ?
प्रदूषण बढ़ने के दौरान लोगों को अपने इलाके का AQI नियमित रूप से देखना चाहिए। हवा की गुणवत्ता खराब होने पर बाहर लंबे समय तक व्यायाम करने से बचें और जरूरत के अनुसार बाहर निकलने का समय सीमित रखें। अधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों में संवेदनशील लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
कुल मिलाकर, देश के कई शहरों में बिगड़ती वायु गुणवत्ता साफ संकेत देती है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर प्रयास जरूरी हैं। सर्दियों में मौसम की परिस्थितियां प्रदूषकों को जमीन के करीब रोक सकती हैं, इसलिए आने वाले समय में हवा की गुणवत्ता पर नजर रखना और समय रहते प्रभावी कदम उठाना अहम होगा।
