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भारत

डेटा प्रोटेक्शन कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा डिजिटल मीडिया

Khushi Mukhija
Last updated: October 28, 2026 11:27 am
Khushi Mukhija
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Yuva India: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून के प्रावधानों को चुनौती देते हुए देश के 21 प्रमुख डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स के संगठन ‘डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन’ (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हालांकि, अदालत ने फिलहाल कानून पर किसी भी तरह की अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है और मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को तय की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील की बड़ी दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने अदालत में दलील दी कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में खबर छापने या रिपोर्ट करने से पहले उससे अनुमति लेनी पड़ी, तो इससे देश के सभी न्यूजरूम बंद हो जाएंगे। उन्होंने इसे खबरों पर पहले से सेंसरशिप लगाने जैसा करार दिया है। वहीं, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘प्रेस की आजादी और नागरिकों की निजता में संतुलन जरूरी है, दोनों अधिकारों का सम्मान करना होगा।’

कानून और विवाद से जुड़ी 5 मुख्य बातें

डीपीडीपी (DPDP) कानून क्या है?

यह कानून वर्ष 2023 में व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। इसके तहत किसी भी व्यक्ति का डेटा इस्तेमाल करने के लिए संबंधित व्यक्ति की सहमति या मजबूत कानूनी आधार होना अनिवार्य है। नियमों का उल्लंघन करने पर 250 करोड़ रुपये तक के भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

पत्रकारों और मीडिया को इस पर आपत्ति क्यों है?

कानून में पत्रकारिता के कामकाज के लिए किसी विशेष छूट का प्रावधान नहीं किया गया है। मीडिया संस्थानों का तर्क है कि इससे सार्वजनिक हित की खबरें जुटाने, उन्हें प्रकाशित करने और गोपनीय सूत्रों की पहचान सुरक्षित रखने में गंभीर बाधा आएगी।

क्या पहले के प्रारूपों में छूट थी?

हाँ, वर्ष 2018, 2019 और 2021 के प्रस्तावित मसौदों में पत्रकारिता से जुड़े कार्यों के लिए छूट का प्रावधान रखा गया था, लेकिन अंतिम रूप से पास हुए कानून में इसे शामिल नहीं किया गया।

आरटीआई (RTI) पर इसका क्या असर पड़ा है?

डेटा प्रोटेक्शन कानून के तहत सूचना का अधिकार (RTI) कानून की धारा 8(1)(ज) में संशोधन किया गया है। इसके पहले व्यापक जनहित में व्यक्तिगत जानकारी साझा करने का प्रावधान था, लेकिन संशोधित धारा के बाद अब व्यक्तिगत जानकारी को सूचना देने से छूट वाली श्रेणी में रख दिया गया है।

सरकार की शक्तियों पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

कानून की धारा 36 और नियम 23 के तहत केंद्र सरकार डेटा रखने वाली संस्थाओं से जानकारी मांग सकती है और जरूरत पड़ने पर उस जानकारी को गोपनीय रखने का निर्देश भी दे सकती है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इसमें पर्याप्त सुरक्षा उपाय और निगरानी का अभाव है।

TAGGED:courtdatadigitallawmediamovesprotectionsupreme
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