महिलाओं का रोजगार 8 साल में दोगुना, फिर भी घर के काम का बोझ कम नहीं; आराम के लिए रोज 70 मिनट कम मिले
Yuva India: देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या पिछले आठ वर्षों में लगभग दोगुनी हो गई है, लेकिन रोजगार में बढ़ती भागीदारी के बावजूद घर की जिम्मेदारियों का बोझ कम नहीं हुआ है। महिलाओं को नौकरी या रोजगार के साथ घर के काम, बच्चों की देखभाल और परिवार की अन्य जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ रही हैं। यही वजह है कि उनके पास पुरुषों के मुकाबले आराम और अपनी पसंद के कामों के लिए कम समय बचता है।
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की अक्टूबर 2026 में जारी रिपोर्ट ‘द पार्टिसिपेशन पैराडॉक्स: विमेंस वर्क एंड टाइम-यूज इन इंडिया (2017-18 टू 2025)’ में यह तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या 2017-18 में 10.4 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 20.1 करोड़ हो गई। इस दौरान कुल कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 22 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत पहुंच गई।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का रोजगार तेजी से बढ़ा
महिलाओं की रोजगार भागीदारी में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिली है। गांवों में महिला कार्यबल भागीदारी 2017-18 के 23.7 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 44.9 प्रतिशत हो गई। वहीं शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 18.2 प्रतिशत से बढ़कर 25.9 प्रतिशत पहुंचा।
हालांकि, रोजगार में बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि महिलाओं को बेहतर वेतन और सुरक्षित नौकरी भी मिल रही है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के रोजगार का बड़ा हिस्सा कृषि, स्वरोजगार और परिवार के कामों में योगदान से जुड़ा है। नियमित वेतन वाली नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है।
घर के काम में महिलाओं का ज्यादा समय खर्च
रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू महिलाओं और पुरुषों के बीच घरेलू काम के समय का अंतर है। आंकड़ों के मुताबिक, महिलाएं प्रतिदिन औसतन 464 मिनट घरेलू कामों में लगाती हैं, जबकि पुरुषों का समय करीब 178 मिनट है। यानी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले घरेलू जिम्मेदारियों में लगभग 286 मिनट यानी करीब 4 घंटे 46 मिनट अधिक देने पड़ते हैं।
बच्चों की देखभाल और घर की जिम्मेदारियां भी महिलाओं के रोजगार में बड़ी बाधा हैं। रिपोर्ट में करीब 60 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि घरेलू जिम्मेदारियों और बच्चों की देखभाल के कारण वे घर से बाहर काम नहीं कर पातीं। इसके मुकाबले पुरुषों में केवल करीब 1 प्रतिशत ने इसे रोजगार न करने की वजह बताया।
आराम के समय में भी बढ़ा अंतर
महिलाओं पर काम का दोहरा बोझ उनके खाली समय को भी प्रभावित कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 से 2024 के बीच पुरुषों और महिलाओं के आराम के समय का अंतर 57 मिनट से बढ़कर 70 मिनट हो गया। यानी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में रोजाना करीब 70 मिनट कम अवकाश मिल रहा है।
इसका मतलब है कि रोजगार में शामिल होने के बाद भी महिलाओं को घर की जिम्मेदारियों से उतनी राहत नहीं मिल रही। कई महिलाओं के लिए कामकाजी दिन खत्म होने के बाद भी घर का काम जारी रहता है।
वेतन में भी महिलाओं को पीछे रहना पड़ रहा
रोजगार बढ़ने के बावजूद महिलाओं और पुरुषों की कमाई में बड़ा अंतर बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की औसत कमाई पुरुषों की कमाई का लगभग 45 प्रतिशत है। शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात करीब 61 प्रतिशत है।
2025 में ग्रामीण महिलाओं की औसत मासिक कमाई 6,596 रुपये थी, जबकि ग्रामीण पुरुषों की कमाई 14,632 रुपये रही। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की औसत मासिक कमाई 15,646 रुपये और पुरुषों की 25,565 रुपये दर्ज की गई।
पंचायतों में भी बढ़ रही महिलाओं की भागीदारी
महिलाओं की भागीदारी केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचायत स्तर पर नेतृत्व में भी उनकी मौजूदगी बढ़ रही है। देश की पंचायतों में करीब 24.41 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों में 12.14 लाख से अधिक महिलाएं हैं। यह कुल प्रतिनिधियों का लगभग 49.75 प्रतिशत है।
राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार 2025 के लिए चुनी गई 48 श्रेष्ठ पंचायतों में से 25 का नेतृत्व महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में था। यह स्थानीय शासन में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को दिखाता है।
रोजगार के साथ घरेलू जिम्मेदारियों में भी बराबरी जरूरी
ICRIER की रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि केवल महिलाओं की रोजगार संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है। उन्हें बेहतर वेतन, नियमित रोजगार, कौशल विकास और काम के अनुकूल सुविधाएं भी मिलनी चाहिए। इसके साथ ही घर के काम और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी पुरुषों और महिलाओं के बीच बराबर बंटना जरूरी है।
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को वास्तविक सशक्तिकरण में बदलने के लिए परिवार, समाज, सरकार और नियोक्ताओं को मिलकर काम करना होगा। तभी महिलाओं को रोजगार के साथ अपने लिए भी समय मिल सकेगा।
