Yuva India: माता-पिता का अपने शहर में रहना और बच्चों का विदेश या अन्य शहरों में नौकरी-व्यापार के सिलसिले में बस जाना आज के कई परिवारों की हकीकत बन चुका है। इसी दूरियों के बीच अब स्टार्टअप्स के लिए एक नया बिजनेस अवसर उभरकर सामने आया है। इस क्षेत्र की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके असली ग्राहक बुजुर्ग नहीं, बल्कि उनके बच्चे हैं जो दूर रहकर भी अपने माता-पिता की बेहतरीन देखभाल चाहते हैं।
बढ़ती दूरियां और केयर स्टार्टअप्स की जरूरत
जकार्ता में विज्ञापन सेक्टर में काम करने वाले अरिंदम भट्टाचार्य के कोलकाता निवासी माता-पिता जब 2024 में उनके पास आए थे, तब अचानक पिता की तबीयत बिगड़ गई। इलाज तो हो गया, लेकिन यह सवाल पीछे छूट गया कि दूर रहकर उनकी देखभाल और निगरानी कैसे हो? ऐसी ही चिंताओं और जरूरतों को पूरा करने के लिए अब लोग हेल्थ मॉनिटरिंग, देखभाल और इमरजेंसी मदद के वास्ते विभिन्न स्टार्टअप्स की सेवाएं ले रहे हैं।
विशाल बाजार और आंकड़े
बढ़ती आबादी: संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, 2050 तक भारत में हर पांचवां व्यक्ति 60 साल से ऊपर का होगा।
नीति आयोग की रिपोर्ट: नीति आयोग के मुताबिक, देश में सीनियर केयर इंडस्ट्री का बाजार लगभग ₹67 हजार करोड़ का है और यह बेहद तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि, रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश के 78% बुजुर्गों के पास पेंशन नहीं है, इसलिए केवल स्टार्टअप्स ही इसका एकमात्र समाधान नहीं हो सकते। इस दिशा में जापान जैसी व्यवस्था से सीख लेने की जरूरत है, जहां लंबी अवधि का केयर बीमा और सरकारी नर्सिंग सुविधाएं दी जाती हैं। वहीं, केरल इस साल बुजुर्गों के अधिकारों पर कानून बनाने वाला देश का पहला राज्य बन गया है।
आवास की मांग: रियल एस्टेट सलाहकार कंपनी कॉliers के अनुमान के अनुसार, भारत में लगभग 20 से 22 लाख ऐसे घरों की मांग है, जबकि वर्तमान में उपलब्धता केवल 25 हजार के करीब ही है।
पोते-पोतियों जैसा साथ और आधुनिक तकनीक
बाजार में सिर्फ मेडिकल केयर ही नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और हाईटेक उपकरणों की मदद देने वाले स्टार्टअप्स भी तेजी से आगे आ रहे हैं:
गुडफेलोज (Goodfellows): साल 2022 में टाटा ट्रस्ट के दिवंगत चेयरमैन रतन टाटा ने जब इस स्टार्टअप में निवेश किया था, तब यह खूब चर्चा में आया था। इसके संस्थापक शांतनु नायडू का कहना है कि इनका मकसद परिवार की जगह लेना नहीं, बल्कि बुजुर्गों के जीवन से अकेलापन दूर करना है। यहाँ युवा साथी बुजुर्गों के साथ वक्त बिताते हैं और उन्हें मोबाइल व इंटरनेट चलाना सिखाते हैं।
कुबो केयर और नोब्लिंक: बेंगलुरु की ये कंपनियां घरों में रडार डिवाइस लगाकर बुजुर्गों की हरकतों पर नजर रखती हैं। बुजुर्ग के अचानक गिरने या बेहोश होने पर यह सिस्टम तुरंत इमरजेंसी सेवाओं को अलर्ट भेज देता है। नोब्लिंक के सह-संस्थापक प्रजित नायर के मुताबिक, डिवाइस की कीमत ₹13,500 है और निगरानी फीस मात्र ₹50 रुपये महीने से शुरू होती है।
चुनौतियां और आगे की राह
विशेषज्ञ रेटिंग एजेंसियों और केयरएज की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि सही प्रशिक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में कुशल कर्मियों की भारी किल्लत हो सकती है। इसके अलावा, बुजुर्ग अक्सर ठगी का आसान शिकार भी बन जाते हैं, इसलिए केयरगिवर्स (देखभाल करने वालों) की सख्त जांच-परख बेहद जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए नीति आयोग ने देश में एक राष्ट्रीय केयरगिविंग पॉलिसी बनाए जाने की जरूरत पर जोर दिया है।
