Yuva India: बच्चों द्वारा इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर हाल ही में एक महत्वपूर्ण अध्ययन के नतीजे सामने आए हैं। ‘इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च’ (ICSSR) द्वारा समर्थित इस अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि इंटरनेट का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग बच्चों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रभावित कर रहा है।
यह अध्ययन ‘एम्पॉवरिंग चिल्ड्रेन इन द डिजिटल एज: एनालिसिस ऑफ एक्सपीरियंस एंड वल्नरेबिलिटी’ (Empowering Children in the Digital Age) शीर्षक से जारी किया गया है। बेनेट यूनिवर्सिटी (उत्तर प्रदेश) की फैकल्टी मोइना खान द्वारा संचालित इस अध्ययन में दिल्ली के विभिन्न स्कूलों के 9 से 14 वर्ष की आयु के 2,000 से अधिक बच्चों और लगभग 500 अभिभावकों के साक्षात्कार शामिल किए गए थे।
सेहत पर पड़ रहा बुरा असर
रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों में इंटरनेट उपयोग के कारण एंग्जाइटी (चिंता), नींद न आना (Sleep Disturbances) और व्यवहार/मूड़ में तेजी से बदलाव सबसे प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं बनकर उभरी हैं। इससे साफ स्पष्ट होता है कि डिजिटल दुनिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन रही है।
रोजाना 4.5 घंटे बीत रहे हैं ऑनलाइन
अध्ययन में पाया गया कि:
- लगभग 6% बच्चे घर से ही इंटरनेट का उपयोग करते हैं और उनका मुख्य जरिया स्मार्टफोन है।
- बच्चे औसतन 5 घंटे प्रतिदिन इंटरनेट पर बिता रहे हैं।
- इंटरनेट उपयोग का मुख्य उद्देश्य पढ़ाई है, जिसके बाद ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो देखना और दोस्तों से बातचीत करना शामिल है।
“तकनीकी कौशल है, लेकिन समझ की कमी”
शोधकर्ता मोइना खान का कहना है कि माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे तकनीक को बहुत बेहतर समझते हैं, लेकिन यह एक भ्रम है। बच्चे तकनीकी या फंक्शनल रूप से तो सक्षम हैं, लेकिन उनमें गंभीर क्रिटिकल थिंकिंग (सोच-समझ) की कमी है।
बच्चे यह नहीं समझ पाते कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर उनका व्यवहार, एल्गोरिदम (Algorithmic Influence) और डिजिटल पावर मैनिपुलेशन द्वारा कैसे नियंत्रित किया जा रहा है। अध्ययन में यह भी देखा गया कि जब बच्चे लंबे समय तक इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते, तो वे अकेलापन महसूस करते हैं। मनपसंद सामग्री न मिलने पर उन्हें गुस्सा आता है और कई बच्चे चाहकर भी इंटरनेट छोड़ नहीं पाते, जो इंटरनेट एडिक्शन (लत) का संकेत है।
अजनबियों से बात और ऑनलाइन खतरे
अध्ययन में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भी कई खुलासे हुए हैं:
- लगभग 47% बच्चों ने स्वीकार किया कि उन्होंने पिछले 6 महीनों में ऑनलाइन अजनबियों से बात की है या गेम खेले हैं।
- 12 से 13 वर्ष के आयु वर्ग में अजनबियों से बातचीत, ऑनलाइन गेमिंग और अनुचित (इनएप्रोप्रिएट) कंटेंट देखना अधिक आम था।
- साइबर बुलिंग और फर्जी आईडी बनाने जैसी घटनाओं के बावजूद, अधिकतर बच्चे ऐसी किसी समस्या की रिपोर्ट माता-पिता या शिक्षकों से नहीं करते हैं। हालांकि, अधिकांश बच्चों के अनुसार वे असहज होने पर माता-पिता से बात करना पसंद करते हैं।
लड़के और लड़कियों के इंटरनेट इस्तेमाल में अंतर
रिपोर्ट में लैंगिक आधार पर भी भिन्नता देखने को मिली है:
- लड़कों को अधिक सामाजिक स्वतंत्रता मिलने के कारण उनका इंटरनेट उपयोग कम नियंत्रित होता है, जिससे वे हानिकारक सामग्री और ऑनलाइन जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- दूसरी ओर, लड़कियों की इंटरनेट तक सीमित पहुंच के कारण उनकी डिजिटल साक्षरता और आत्म-सुरक्षा (Self-protection) से जुड़े कौशल प्रभावित हो सकते हैं।
क्या है समाधान?
अध्ययन में सिफारिश की गई है कि उभरती प्रौद्योगिकियों के इस दौर में बच्चों को सुरक्षित रूप से डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिए स्कूलों और अभिभावकों को मिलकर एक सहयोगी ढांचा (Collaborative Multi-stakeholder Framework) तैयार करना चाहिए। इसके साथ ही, बच्चों और अभिभावकों दोनों के लिए डिजिटल साक्षरता को प्रोत्साहित करना बेहद आवश्यक है।

