Yuva India: मतदाता सूची में नाम जोड़ने या किसी नाम को हटाने से संबंधित आवेदन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने Form 7 के थोक आवेदनों पर नई सीमाएं तय की हैं। आयोग ने निर्देश दिया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान दावे और आपत्तियों की अवधि में कोई व्यक्तिगत मतदाता नाम जोड़ने या हटाने से जुड़े अधिकतम 10 आवेदन ही जमा कर सकेगा। इस कदम का उद्देश्य मतदाता सूची को प्रभावित करने के लिए बड़ी संख्या में आवेदन दाखिल करने की कोशिशों पर रोक लगाना है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब कर्नाटक सहित कुछ राज्यों में Form 7 के बड़ी संख्या में आवेदन दाखिल किए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आए हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि कर्नाटक के बल्लारी में भाजपा के एक कार्यकर्ता ने कथित तौर पर 7,561 आवेदन जमा किए। चुनाव आयोग ने इस तरह की शिकायतों के बीच आवेदन प्रक्रिया को स्पष्ट और नियंत्रित करने के लिए कदम उठाया है।
Form 7 के आवेदन पर क्या होंगे नए नियम ?
Form 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने या किसी मतदाता का नाम हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। आयोग के नए निर्देशों के मुताबिक, दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान किसी व्यक्तिगत मतदाता की ओर से दाखिल किए जाने वाले ऐसे आवेदनों की संख्या अधिकतम 10 होगी।
मतदाता सूची के निरंतर अद्यतन के दौरान भी एक मतदाता के लिए Form 7 आवेदन की सीमा पांच प्रति माह तय की गई है। इससे पहले एक व्यक्ति द्वारा ऑनलाइन आवेदन दाखिल करने की संख्या पर सीमा थी, लेकिन एक साथ बड़ी संख्या में भौतिक फॉर्म जमा करने के मामले में स्पष्ट सीमा नहीं थी। नए निर्देशों का उद्देश्य इस अस्पष्टता को दूर करना है।
बूथ लेवल एजेंटों के लिए अलग व्यवस्था
विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट (BLA) निर्धारित प्रक्रिया के तहत Form 7 के आवेदन जमा कर सकते हैं। मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले एक दिन में अधिकतम 50 फॉर्म और उसके बाद प्रतिदिन 10 फॉर्म जमा करने की व्यवस्था बताई गई है।
यह व्यवस्था व्यक्तिगत मतदाताओं पर लागू सीमा से अलग है। आयोग का उद्देश्य राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रतिनिधियों के माध्यम से आने वाले आवेदनों और व्यक्तिगत मतदाताओं के आवेदनों के बीच स्पष्ट अंतर रखना है।
गलत और फर्जी आवेदनों पर कार्रवाई
चुनाव आयोग ने निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) को निर्देश दिया है कि वे गलत या मनगढ़ंत जानकारी के आधार पर दाखिल किए गए Form 7 आवेदनों पर कार्रवाई करें। नियमों के अनुसार, निर्धारित अवधि या तय तरीके का पालन किए बिना दाखिल आवेदन खारिज किए जा सकते हैं।
यदि कोई आवेदन नियमों के अनुरूप पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारी आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति को नोटिस जारी कर सकता है। इसके बाद उसकी बात सुनी जाएगी और प्रत्येक आवेदन के संबंध में उपलब्ध जानकारी की जांच की जाएगी। अधिकारी को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आपत्ति दर्ज कराने वाला व्यक्ति संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज है।
जानबूझकर झूठा बयान या गलत घोषणा करने के मामलों में जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 के तहत कार्रवाई भी हो सकती है। आयोग का जोर यह सुनिश्चित करने पर है कि मतदाता सूची में बदलाव वास्तविक तथ्यों और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर ही हो।
सुप्रीम कोर्ट ने भी मतदाता सूची पर दिया जोर
इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की नगर निकाय चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मामलों में कहा है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की मांग करने वाली लंबित अपीलों के मुकाबले नाम हटाए जाने की चुनौतियों को प्राथमिकता से सुना जाना चाहिए। अदालत के सामने बड़ी संख्या में लंबित अपीलों और चुनाव प्रक्रिया पर उनके संभावित असर का मुद्दा उठा था।
अदालत ने मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टि वाले मतदाताओं के नाम हटाने के सिद्धांत को भी उचित माना। हालांकि, स्थानीय निकाय चुनावों में इस्तेमाल होने वाली मतदाता सूची के संबंध में अंतिम सूची और लागू कानूनों की अहमियत बनी रहेगी।
इस तरह, चुनाव आयोग की ओर से Form 7 पर लगाई गई सीमाएं और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां मतदाता सूची की शुद्धता तथा चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करती हैं।

