SIR के तीनों आदेश सर्वसम्मति से जारी, फॉर्म-6 में बदलाव नहीं: चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा
Yuva India: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच भारत निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर अपने फैसलों का बचाव किया है। आयोग ने कहा कि वर्ष 2025 और 2026 में SIR से जुड़े जारी किए गए तीनों आदेश तीनों निर्वाचन आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने फॉर्म-6 में बदलाव किए जाने के आरोपों को भी खारिज किया है। उसका कहना है कि SIR के दौरान इस्तेमाल किया गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र फॉर्म-6 से अलग दस्तावेज है।
तीनों आदेशों पर सभी निर्वाचन आयुक्तों की सहमति का दावा
निर्वाचन आयोग ने अपने जवाब में कहा कि SIR से संबंधित तीन आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी किए गए थे। आयोग के मुताबिक, इन सभी आदेशों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की सर्वसम्मति से मंजूरी मिली थी।
यह हलफनामा आयोग के कामकाज और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के फैसले लेने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि SIR से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण फैसले अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। आयोग ने इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि व्यक्तिगत टिप्पणियां, सवाल या सुझाव अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं होते।
फॉर्म-6 में बदलाव के आरोप पर क्या कहा?
फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस वैधानिक फॉर्म में कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार, फॉर्म-6 का निर्धारित प्रारूप बदलने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
SIR के दौरान जो अतिरिक्त घोषणा-पत्र इस्तेमाल किया गया, उसका उद्देश्य आवेदक की जानकारी को पहले की मतदाता सूचियों से जोड़ना और पात्रता की जांच में मदद करना था। आयोग ने कहा कि इसे फॉर्म-6 में बदलाव मानना सही नहीं है।
हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में फॉर्म-6 और अतिरिक्त घोषणा-पत्र जिस तरह दिखाई दे रहे थे, उससे बदलाव होने का भ्रम पैदा हो सकता था। इस समस्या को दूर करने के लिए 21 अक्टूबर 2026 से ऑनलाइन फॉर्म-6 आवेदन और SIR घोषणा-पत्र को अलग-अलग हिस्सों में दिखाने की व्यवस्था की गई।
आयोग ने SIR प्रक्रिया को बताया कानूनी
निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण संविधान और संबंधित चुनाव कानूनों के तहत उसके अधिकार क्षेत्र में आता है। आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 का हवाला देते हुए SIR प्रक्रिया को कानूनी बताया।
आयोग ने यह भी कहा कि फाइलों पर अधिकारियों और निर्वाचन आयुक्तों की टिप्पणियां प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जा सकती है और उसे बाद में संबंधित फाइल में दर्ज किया जाता है। आयोग के मुताबिक, अंतिम निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए जाते हैं।
महाराष्ट्र में SIR को चुनौती देने वाली याचिका पर भी सुनवाई
इसी बीच महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली एक अलग याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने अदालत में दावा किया कि राज्य की मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं। उन्होंने कहा कि पुनर्विकास के कारण मुंबई और पुणे में अस्थायी रूप से स्थान बदलने वाले कुछ मतदाताओं को उनके पते पर नहीं मिलने के आधार पर सूची से बाहर कर दिया गया।
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर 2026 के लिए तय की है। याचिका में SIR की प्रक्रिया पर रोक लगाने और हटाए गए मतदाताओं के नामों से जुड़े मुद्दों पर हस्तक्षेप की मांग की गई है। ये आरोप याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए हैं; इन पर अंतिम न्यायिक फैसला आना बाकी है।
अब सुप्रीम कोर्ट के रुख पर नजर
निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में आरोपों को खारिज करते हुए याचिका को निराधार बताया है। दूसरी ओर, SIR की प्रक्रिया और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर उठाए गए सवालों पर न्यायिक सुनवाई जारी है।
आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग की प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े विवादों पर अदालत क्या रुख अपनाती है। फिलहाल आयोग का पक्ष है कि SIR के तीनों आदेश सर्वसम्मति से जारी हुए और फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया।
