हिमालय में खतरे वाले इलाकों में 45% बढ़ा निर्माण, करीब 3 लाख लोग बाढ़ की जद में
Yuva India: हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ता निर्माण अब लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता बनता जा रहा है। नदियों के किनारे, पहाड़ी घाटियों और ग्लेशियल झीलों के आसपास घर, होटल, पर्यटन सुविधाएं और अन्य इमारतें तेजी से बनाई जा रही हैं। इससे बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, हिमालय के संभावित बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में साल 2016 से 2023 के बीच इमारतों का क्षेत्रफल करीब 45 प्रतिशत बढ़ गया। अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2026 में लगभग 2.94 लाख लोग ऐसे इलाकों में रह रहे हो सकते हैं, जहां बाढ़ का संभावित खतरा मौजूद है।
यह अध्ययन नेपाल, दक्षिण-पूर्वी तिब्बत और भारत के उत्तराखंड के कुछ हिस्सों पर केंद्रित है। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन क्षेत्रों में पर्यटन सुविधाओं, आवासीय इमारतों, बुनियादी ढांचे और रियल एस्टेट का विस्तार तेजी से हुआ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि निर्माण गतिविधियों का विस्तार ऐसे इलाकों में भी हो रहा है, जहां नदियों में अचानक बाढ़ आने या ग्लेशियल झीलों के फटने से भारी नुकसान हो सकता है।
ग्लेशियल झीलों के आसपास भी तेजी से बढ़ा निर्माण
अध्ययन में 1,361 हिमालयी ग्लेशियल झीलों और उनसे नीचे की ओर 50 किलोमीटर तक फैले नदी क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने अलग-अलग सैटेलाइट और बिल्डिंग डेटा की मदद से वर्ष 2016 से 2023 के बीच निर्माण में हुए बदलावों का आकलन किया।
नतीजों के मुताबिक, नदियों के जलमार्ग से 50 मीटर की ऊंचाई के दायरे में आने वाली इमारतों का कुल क्षेत्रफल 2016 में 12.38 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में बढ़कर 18.04 वर्ग किलोमीटर हो गया। यानी इसमें करीब 45.75 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
सबसे ज्यादा चिंता ग्लेशियल झीलों से संभावित बाढ़ वाले क्षेत्रों में निर्माण को लेकर जताई गई है। ऐसे इलाकों में इमारतों का क्षेत्रफल 2016 में 0.72 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में बढ़कर 1.28 वर्ग किलोमीटर हो गया। यह करीब 77.78 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।
करीब 2.94 लाख लोग संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में
शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, अध्ययन में शामिल क्षेत्रों की आबादी में से करीब 18 प्रतिशत यानी लगभग 2,93,800 लोग वर्ष 2026 में संभावित बाढ़ जोखिम वाले इलाकों में रह रहे हो सकते हैं। इनमें नेपाल के करीब 1,08,500 लोग शामिल हैं। नेपाल में लगभग 22,800 लोग नदी के जलमार्ग से 10 मीटर की ऊंचाई के दायरे में स्थित इमारतों में रह सकते हैं।
अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2015 से 2030 के बीच संभावित बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाली आबादी में करीब 17,900 लोगों यानी 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े उपलब्ध भवनों और जनसंख्या संबंधी डेटा के आधार पर लगाए गए अनुमान हैं। वास्तविक संख्या इससे अलग हो सकती है।
नेपाल की बाढ़ की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
हिमालयी क्षेत्रों में पहले भी अचानक बाढ़ की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। नेपाल में अगस्त 2026 में आई भीषण बाढ़ के दौरान 1,400 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और हजारों लोग लापता हो गए थे। इसके बाद 11 अक्टूबर को बूढ़ी गंडकी नदी में आई बाढ़ से करीब 200 घर क्षतिग्रस्त हुए, पांच पुल बह गए और पांच लोग लापता बताए गए।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश, ग्लेशियरों का पिघलना और ग्लेशियल झीलों का बढ़ता आकार बाढ़ के खतरे को गंभीर बना सकते हैं। संकरी घाटियों में पानी और मलबे का बहाव तेजी से नीचे की ओर पहुंच सकता है, जिससे नदी किनारे बसे गांवों, पर्यटन स्थलों और बुनियादी ढांचे को नुकसान हो सकता है।
अनियोजित निर्माण पर नियंत्रण जरूरी
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि केवल प्राकृतिक आपदाओं को रोकने की कोशिश पर्याप्त नहीं होगी। जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को नियंत्रित करना और जमीन के इस्तेमाल की बेहतर योजना बनाना भी जरूरी है। इसके लिए नदियों और ग्लेशियल झीलों के आसपास संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, सटीक भवन डेटाबेस, नियमित निगरानी और आपदा प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था विकसित करनी होगी।
यह अध्ययन बताता है कि हिमालय में बढ़ता निर्माण और बदलती जलवायु मिलकर जोखिम को और गंभीर बना सकते हैं। ऐसे में विकास परियोजनाओं को मंजूरी देते समय पर्यावरणीय संवेदनशीलता और स्थानीय भूगोल को ध्यान में रखना जरूरी है, ताकि पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
