Yuva India: पंजाब और हरियाणा में खेतों में जलाई जाने वाली पराली (Farm Fires) ने एक बार फिर दिल्ली की हवा को जहरीला बना दिया है। रविवार को पराली के धुएं के कारण दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) तेजी से गिरकर ‘बहुत खराब’ श्रेणी में पहुंच गया, जबकि सोमवार को स्थिति और अधिक गंभीर होकर ‘बेहद खराब’ (Very Poor) स्तर पर दर्ज की गई।
हिन्दुस्तान टाइम्स के विश्लेषण और उपग्रह (Satellite) डेटा से यह खुलासा हुआ है कि इस बार प्रदूषण का यह भारी संकट इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि अधिकांश पराली में आग शाम के वक्त लगाई गई थी। चूंकि नासा (NASA) का मुख्य उपग्रह आमतौर पर दोपहर के समय ही क्षेत्र के ऊपर से गुजरता है, इसलिए शाम को जलाई जाने वाली आग आधिकारिक डेटा में दर्ज होने से छूट जाती है। यही कारण है कि सैटेलाइट काउंट और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला है।
आंकड़ों में सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई
नवीनतम सीएक्यूएम (CAQM) रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 72 घंटों में 500 से अधिक खेतों में आग लगने की घटनाएं दर्ज की गईं, अकेले पंजाब में 1 नवंबर को 1,534 खेत में आग लगने की घटनाएं सामने आईं। इस बीच, दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स शनिवार को 117 से बढ़कर रविवार को 201 पर पहुंच गया। सोमवार शाम 4 बजे तक AQI 324 तक जा पहुंचा, जो इस सीजन का दूसरा सबसे खराब प्रदूषण स्तर रहा। फरवरी के बाद यह इस साल का सबसे खराब दिन दर्ज किया गया।
शाम की आग और मौसम का खतरनाक मेल
विशेष विश्लेषण से पता चलता है कि INSAT जैसे अन्य उपग्रह, जो शाम के समय निगरानी करते हैं, उन्होंने पाया कि शाम ढलने के बाद पराली जलाने की घटनाओं में भारी बढ़ोतरी हुई। कई दिनों में शाम के समय शून्य या बेहद कम दिखने वाली आग की संख्या बढ़कर 90 तक दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब शाम को हवा की गति कम हो जाती है और तापमान में गिरावट आती है, तो एक मजबूत ‘ताप व्युत्क्रमण’ (Temperature Inversion) की स्थिति बनती है। इसके कारण पराली का धुआं जमीन के करीब ही फंसकर रह जाता है और हवा में फैल नहीं पाता है। यही वजह है कि साफ दिखने वाले मौसम या कम आग के बावजूद, रात के समय पीएम 2।5 (PM 2।5) का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है।
डेटा और विश्लेषण की सीमाएं
विश्लेषण में यह भी स्पष्ट किया गया है कि बारिश के कारण धुआं हवा से साफ जरूर हुआ, लेकिन हवा में नमी होने के कारण प्रदूषण के कण छोटे और अधिक जहरीले रूपों में तब्दील हो गए। इसके अलावा, कुल प्रदूषण में केवल पराली ही नहीं, बल्कि स्थानीय धूल, सड़क निर्माण और वाहनों का धुआं भी अहम भूमिका निभा रहा है।
