दिवाली पर भी शोक मनाते हैं जोधपुर के मौड़गिल ब्राह्मण, रावण को मानते हैं पूर्वज और शिवभक्त
Yuva India: देशभर में दिवाली का त्योहार भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। घरों में दीप जलाए जाते हैं, मिठाइयां बांटी जाती हैं और लोग खुशियां मनाते हैं। लेकिन राजस्थान के जोधपुर में कुछ ऐसे ब्राह्मण परिवार भी हैं, जिनकी परंपरा बाकी लोगों से अलग है। ये परिवार दिवाली और दशहरे को केवल उत्सव के रूप में नहीं देखते, बल्कि रावण को अपना पूर्वज मानकर उससे जुड़ी धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं का पालन करते हैं। समुदाय की मान्यता के अनुसार, रावण उनके गोत्र के पूर्वज और भगवान शिव के बड़े भक्त थे।
रावण को गोत्र भाई और पूर्वज मानते हैं परिवार
जोधपुर के मौड़गिल ब्राह्मण समुदाय के कुछ परिवार रावण को अपना पूर्वज और गोत्र भाई मानते हैं। उनकी मान्यता है कि रावण का विवाह मंदोदरी से जोधपुर के पास स्थित मंडोर में हुआ था। मंदोदरी को मंडोर के राजा मयासुर की पुत्री माना जाता है। इसी पारंपरिक कथा के अनुसार, रावण जब लंका से बारात लेकर मंडोर पहुंचा था, तब उसके साथ आए कुछ रिश्तेदार विवाह के बाद यहीं बस गए। समुदाय के लोग अपनी उत्पत्ति उन्हीं परिवारों से जोड़ते हैं।
मंडोर में आज भी एक स्थान को रावण की चंवरी कहा जाता है। स्थानीय मान्यता है कि इसी जगह रावण और मंदोदरी का विवाह हुआ था। हालांकि, यह धार्मिक और स्थानीय लोकपरंपरा से जुड़ी मान्यता है, इसका कोई निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
रावण को विद्वान और शिवभक्त के रूप में पूजते हैं
समुदाय की मान्यता में रावण केवल लंका का राजा नहीं था, बल्कि वह वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता, कुशल संगीतकार और भगवान शिव का परम भक्त भी था। परिवारों का कहना है कि वे रावण के अच्छे गुणों, विद्वता और शिवभक्ति को सम्मान देते हैं। इसी कारण उनके लिए रावण की स्मृति धार्मिक और पारिवारिक आस्था से जुड़ी हुई है।
जोधपुर में रावण की पूजा के लिए मंदिर भी बनाया गया है। यहां रावण और मंदोदरी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। प्रतिमाओं में रावण को भगवान शिव की आराधना करते हुए दर्शाया गया है। समुदाय के पुजारी और परिवारों के सदस्य विशेष अवसरों पर यहां पूजा-अर्चना करते हैं।
दशहरे पर रावण दहन के बाद निभाते हैं श्राद्ध की परंपरा
जब देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, तब जोधपुर के ये परिवार अपने पूर्वज की मृत्यु के शोक से जुड़ी रस्में निभाते हैं। समुदाय की परंपरा के अनुसार, श्राद्ध पक्ष से ही रावण की पूजा और स्मरण की शुरुआत होती है। दशहरे के दिन विशेष पूजा की जाती है और रावण की आत्मा की शांति के लिए फूल, मिठाई और भोजन अर्पित किए जाते हैं।
कुछ परिवारों में रावण दहन के बाद स्नान करने, पवित्र जनेऊ बदलने और मंदिर में एकत्र होकर पूजा करने की परंपरा भी है। इस आयोजन को परिवार अपने पूर्वज के प्रति श्रद्धा जताने का अवसर मानते हैं।
दिवाली पर भी शोक की परंपरा का उल्लेख
समाचार रिपोर्ट के अनुसार, पहले समुदाय के कुछ परिवार दिवाली के अवसर पर भी शोक से जुड़ी औपचारिकताएं निभाते थे। उनका मानना था कि यह भगवान श्रीराम की विजय का विरोध नहीं, बल्कि रावण के प्रति पारिवारिक सम्मान जताने का तरीका है। हालांकि, समय के साथ यह परंपरा सीमित होती गई है और नई पीढ़ी में दिवाली का त्योहार सामान्य रूप से मनाने वाले परिवार भी हैं।
इस परंपरा का अर्थ यह नहीं है कि समुदाय भगवान श्रीराम की विजय का विरोध करता है। उनके लिए रावण की विद्वता, शिवभक्ति और पारिवारिक संबंधों को याद करना अलग धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है।
पीढ़ियों से चली आ रही है यह मान्यता
जोधपुर में दवे गोधा और मौड़गिल नाम से जुड़ी ब्राह्मण परंपराओं में रावण को पूर्वज मानने की मान्यता का उल्लेख मिलता है। स्थानीय परिवारों के लिए यह केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक विरासत का हिस्सा है। कुछ परिवार आज भी दशहरे पर श्राद्ध और विशेष पूजा करते हैं तथा नई पीढ़ी को इस परंपरा के बारे में बताते हैं।
एक ओर देश में दिवाली दीपों, खुशियों और उत्सव का प्रतीक है, वहीं जोधपुर के इन परिवारों की मान्यता इस त्योहार और रावण से जुड़ी लोककथाओं का एक अलग सांस्कृतिक पहलू सामने लाती है।
