Yuva India: भारत में कैंसर से पीड़ित बच्चों के लिए बीमारी के इलाज के साथ-साथ अस्पताल तक पहुंचना भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। देश में विशेष बाल कैंसर (पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी) केंद्रों की असमान उपलब्धता के कारण सैकड़ों बच्चों और उनके परिवारों को इलाज कराने के लिए लंबी दूरियों का सफर तय करना पड़ता है।
ब्रिटेन के प्रतिष्ठित जर्नल ‘कैंसर पॉलिसी’ में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन के अनुसार, भारत में लगभग 60% बच्चों को विशेष कैंसर केंद्र तक पहुंचने में 2 घंटे से अधिक समय लग जाता है।
हर साल 32 हजार गरीब परिवारों को छोड़ना पड़ता है घर
अध्ययन में सामने आया है कि हर साल 32 हजार से अधिक गरीब परिवारों को बच्चों के बेहतर इलाज के लिए अपने घर-गांव छोड़कर बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। लंबी दूरी, समय की बर्बादी और भारी आर्थिक खर्चों के कारण कई बार इलाज में देरी हो जाती है या परिवार बीच में ही इलाज छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।
इसके अलावा, विशेष अस्पताल महानगरों में सीमित होने के कारण मरीज के परिजनों के सामने रहने और खाने-पीने का भी भारी संकट खड़ा हो जाता है। गैर-लाभकारी संस्था सेंट जूड्स इंडिया के अनुसार, देश में हर साल करीब 50 हजार बच्चे कैंसर से प्रभावित होते हैं।
तुलना की जाए तो अमेरिका में बच्चों के कैंसर विशेषज्ञ (पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजिस्ट) तक पहुंचने में औसतन केवल 20 मिनट और जापान में 37 मिनट का समय लगता है।
पूर्वी भारत में स्थिति सबसे मुश्किल, दक्षिण में बेहतर सुविधाएं
कैंसर के इलाज की सुविधाएं देश के सभी राज्यों में समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। विशेषज्ञ केंद्रों की कमी की वजह से पूर्वी और मध्य भारत के मरीजों को इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है, जिससे उन पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है।
- दक्षिण भारत: प्रति 10 लाख आबादी पर 06 रेडियोथेरेपी मशीनें।
- पश्चिम भारत: प्रति 10 लाख आबादी पर 86 रेडियोथेरेपी मशीनें।
- पूर्वी भारत: प्रति 10 लाख आबादी पर महज 23 रेडियोथेरेपी मशीनें (वर्ष 2022 के आंकड़े)।
दक्षिण एशिया में 68% बाल कैंसर मरीज भारत से
अध्ययन और अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक:
- भारत में कैंसर के कुल बाल केस: 25,939
- दक्षिण एशिया में कुल बाल कैंसर मरीज: 37,700
- दक्षिण एशिया में अनुमानित मौते: 17,700
उत्तर प्रदेश से इलाज कराने पहुंच रहे सबसे ज्यादा मरीज
‘कैंसर पॉलिसी’ के इस अध्ययन में 2005 से 2019 के बीच इलाज कराने वाले बच्चों का विश्लेषण किया गया। इसमें सबसे अधिक मरीज उत्तर प्रदेश से सामने आए:
- उत्तर प्रदेश: 5,057 बच्चे (कुल मरीजों का 6%)
- दिल्ली: 4,287 बच्चे
- तमिलनाडु: 4,010 बच्चे
- आंध्र प्रदेश: 1,354 बच्चे
लड़कियों से दोगुने लड़कों को मिल रहा इलाज
अध्ययन में शामिल कुल बच्चों में 15,067 लड़के और 7,261 लड़कियां थीं। शोधकर्ताओं के अनुसार, भारतीय समाज में लड़कों के स्वास्थ्य पर परिवारों द्वारा अधिक समय और पैसा खर्च करने की प्रवृत्ति भी इस लैंगिक अंतर की एक बड़ी वजह हो सकती है।
ट्यूमर से पीड़ित बच्चों को अधिक परेशानी
अध्ययन में शामिल 12,093 बच्चों को ट्यूमर (हड्डियों, मस्तिष्क, गुर्दे और मांसपेशियों का कैंसर) की समस्या थी। ऐसे बच्चों को रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया) से पीड़ित बच्चों की तुलना में इलाज के लिए ज्यादा दूरी तय करनी पड़ती है, क्योंकि इनके इलाज के लिए जटिल सर्जरी और विकिरण (रेडिएशन) जैसी विशेष सुविधाओं की तत्काल आवश्यकता होती है।
