Yuva India: जब घर के बड़े-बुजुर्ग दुनिया से चले जाते हैं, तब उनकी यादें और उनकी आवाजें ही हमारे पास शेष रह जाती हैं। कई बार मन में मलाल रहता है कि काश उनकी आवाज रिकॉर्ड कर ली होती। रायपुर के गुढ़ियारी में रहने वाले 26 वर्षीय छात्र खुशाल खोड़ियार के जीवन का एक मोड़ यही अहसास बना, जिसके बाद उन्होंने पुरखों की आवाज़ों और पारिवारिक धरोहरों को हमेशा के लिए सहेजने का बीड़ा उठाया। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ आर्काइवल प्रोजेक्ट’ की शुरुआत की है, जिसके जरिए वे परिवारों की कहानियों और दस्तावेजों को डिजिटल रूप दे रहे हैं।
परिवारों की कहानियां और डिजिटल होती यादें
खुशाल का मानना है कि हर घर में शहर और समाज के निर्माण से जुड़ी हुई खास कहानियां छिपी होती हैं। वे इसी बिखरे हुए पारिवारिक इतिहास को खोजकर डिजिटाइज कर रहे हैं। उन्होंने इस अनूठी पहल की शुरुआत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित रविशंकर शुक्ल के ऐतिहासिक ‘शुक्ल भवन’ से की, जहां परिवार के सदस्यों का मौखिक इतिहास रिकॉर्ड किया गया।
‘दादाजी चले गए तो उनकी आवाज खोने की अहमियत समझ आई’
खुशाल बताते हैं कि जब उनके दादाजी जीवित थे, तब वे कई पुरानी कहानियां सुनाते थे। उस समय कुछ बातें पहुंचीं और कुछ छूट गईं। आज जब वे नहीं हैं, तो उनकी आवाज न सुन पाने का अहसास होता है। खुशाल के अनुसार, “तब लगता है कि मैंने रिकॉर्डिंग की होती तो कितना अच्छा होता! इसी बात ने मुझे आर्काइव करने की असली अहमियत समझाई। आज वे लोगों के घरों में मौजूद दशकों पुरानी तस्वीरें, संघर्ष के किस्से और अलमारियों में रखी पारिवारिक धरोहरों को सहेजने में जुटे हैं।
संस्थाओं और गुमनाम इतिहास का रिकॉर्ड
देशभर में तेजी से हो रहे शहरीकरण के बीच ऐतिहासिक इमारतों और शिलालेखाें के मिटने का सिलसिला जारी है। ऐसे में खुशाल अनदेखे पत्थरों पर लिखी जानकारियों को भी जुटा रहे हैं। इसके साथ ही, वे उन सामाजिक संस्थाओं के कार्यों को भी डिजिटाइज कर रहे हैं, जो आज की समस्याओं से निपटने में लोगों की मदद कर रही हैं।
इस प्रोजेक्ट के माध्यम से रायपुर का यह युवा इतिहास को मिटने से बचाने और आने वाली पीढ़ियों तक पुरखों की आवाज को गूंजते रखने का सराहनीय प्रयास कर रहा है।
