Yuva India: देश में पैकेज्ड फूड्स पर चेतावनी लेबल (Warning Labels) लागू करने में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) को जमकर फटकार लगाई है। अदालत ने चिंता व्यक्त करते हुए पूछा कि जब मामला सीधे देश के नागरिकों और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा है, तो खाद्य सुरक्षा नियामक को इसे लागू करने में लगभग दो साल का समय क्यों चाहिए?
चार साल से आप क्या कर रहे थे?
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गैर-लाभकारी संगठन 3S and Our Health Society द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाते हुए सवाल किया:
“एक साल के लिए स्वैच्छिक अनुपालन क्यों? आपको इतना समय क्यों चाहिए? आप नए सिरे से सुनवाई करने और आपत्तियां मांगने की प्रक्रिया क्यों शुरू करना चाहते हैं? आपने 2022 में शुरुआत की थी, पिछले चार वर्षों में आपने क्या किया?”
FSSAI का पक्ष: प्रक्रिया में लगेगा समय
FSSAI की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ब्रिजेंदर चाहर ने अदालत को बताया कि 2022 में शुरू की गई प्रक्रिया ‘इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग’ (स्टार-रेटिंग सिस्टम) से जुड़ी थी, जो कि वर्तमान में विचाराधीन वार्निंग-लेबल व्यवस्था से बिल्कुल अलग मापदंडों पर आधारित है।
FSSAI ने अपने हलफनामे में कहा कि:
नए नियमों के मसौदे को तैयार करने, परामर्श लेने और अंतिम रूप देने में कम से कम 4 महीने का समय लगेगा।
नए लेबलिंग मानदंडों को अगले साल 1 जुलाई तक अधिसूचित करने का प्रस्ताव है।
इसके बाद खाद्य व्यवसाय ऑपरेटरो को नए ढांचे में ढलने के लिए 365 दिनों का ट्रांजिट समय दिया जाएगा।
जनहित और अदालत का संदेश
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील राजीव शंकर द्विवेदी ने दलील दी कि पैकेज्ड फूड्स में नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट की अत्यधिक मात्रा के प्रति उपभोक्ताओं और बच्चों को सचेत करने के लिए वार्निंग लेबल अनिवार्य हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के उसके उद्देश्य को पूरा करने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अदालत ने फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा कि उसके आगामी निर्देश नियामक के लिए अनिवार्य होंगे और वह खुद इस मामले की निगरानी करेगा ताकि अनुपालन में कोई ढिलाई न हो।
